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अनुच्छेद 21 और 22 का उल्लंघन करने पर कोर्ट ने लगाई पुलिस को कड़ी फटकार , शादी का झांसा देकर यौन संबंध बनाने और SC/ST एक्ट के आरोपी की गिरफ्तारी अवैध होने के कारण रिमांड प्रार्थना पत्र किया खारिज , मुख्य न्यायिक अधिकारी लखनऊ को भी दिशा निर्देश जारी l

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लखनऊ, 11 सितंबर 2025: उत्तर प्रदेश के लखनऊ स्थित विशेष न्यायालय (SC/ST एक्ट) में कल 10 सितंबर को एक महत्वपूर्ण मामले में सुनवाई के दौरान आरोपी की गिरफ्तारी की वैधता को लेकर तीखी बहस हुई। मामला मुकदमा संख्या 783/2025 से जुड़ा है, जो थाना सुशांत गोल्फ सिटी में धारा 69 बीएनएस (भादंसं की धारा 376 के समकक्ष) और धारा 3(2)(5) SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दर्ज है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसले ‘विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य’ (2025 INSC 162) का हवाला देते हुए गिरफ्तारी के आधारों की जांच पर पाया की पुलिस ने आरोपी को बिना गिरफ्तारी के आधार बताए गिरफ्तार कर लिया था।

मामले के आरोपी सचिन सिंह को 3 सितंबर 2025 को रात 8:45 बजे गिरफ्तार किया गया था। पुलिस ने दावा किया कि आरोपी स्वयं थाने पहुंचा और जांच अधिकारी उपनिरीक्षक ज्ञानेंद्र सिंह द्वारा मुकदमे की सूचना मिलने पर आत्मसमर्पण कर दिया। कोर्ट ने अभिलेखों के अवलोकन से पाया कि गिरफ्तारी मेमो में उल्लेख है कि 10 वर्ष की सजा वाले अपराध के कारण गिरफ्तारी की गई, और आरोपी के पिता को सूचित कर दिया गया। सहायक पुलिस आयुक्त ऋषभ रूढ़वाल ने 10 सितंबर को प्रार्थना पत्र देकर वारंट संशोधित कर रिमांड स्वीकृत करने की मांग की, क्योंकि पीड़िता अनुसूचित जाति से है और आरोपी जिला कारागार में बंद है।

आरोपी के वकील श्री शिखर गुप्ता ने गिरफ्तारी को असंवैधानिक बताते हुए विरोध जताया। उन्होंने तर्क दिया कि गिरफ्तारी मेमो में स्पष्ट रूप से गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) एवं 22 (गिरफ्तारी और हिरासत के सुरक्षा) का उल्लंघन है। श्री शिखर गुप्ता ने सुप्रीम कोर्ट के 7 फरवरी 2025 के फैसले ‘विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य’ का विधिक दृष्टांत प्रस्तुत किया, जिसमें कहा गया है कि बिना लिखित रूप से गिरफ्तारी के आधार बताए गिरफ्तार करना अवैध है। उन्होंने जोर दिया कि जीडी एंट्री या केस डायरी में सामान्य उल्लेख पर्याप्त नहीं; आरोपी को विस्तृत कारण बताना अनिवार्य है।
दूसरी ओर, वरिष्ठ लोक अभियोजक अरविंद मिश्रा ने बचाव पक्ष के तर्कों को आधारहीन बताते हुए कहा कि जीडी संख्या 60 (3 सितंबर 2025, रात 9:27 बजे) में स्पष्ट उल्लेख है कि आरोपी अपने पिता दुर्गेश सिंह और बहन मुस्कान के साथ थाने आया और मुकदमे की जानकारी दी गई। इसके बाद जांच अधिकारी ने आरोपी को मुकदमे से अवगत कराया, पूछताछ की और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए हिरासत में लिया। अभियोजक ने दावा किया कि गिरफ्तारी पूरी तरह वैध है और सभी प्रक्रियात्मक औपचारिकताएं पूरी की गईं।
विशेष न्यायाधीश ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद प्रपत्रों का गहन परीक्षण किया। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उक्त फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यदि गिरफ्तारी के आधार अभियुक्त को बिना बताए गिरफ्तार किया जाता है, तो ऐसी गिरफ्तारी अवैध मानी जाएगी। फैसले में स्पष्ट किया गया है कि अभियुक्त को लिखित रूप में कारण बताना आवश्यक है, और जीडी या केस डायरी में सामान्य वाक्यांश जैसे “कारण बताते हुए गिरफ्तार किया गया” पर्याप्त नहीं। जीडी में विस्तार से गिरफ्तारी का कारण उल्लिखित होना चाहिए। जस्टिस अभय एस. ओका और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने विहान कुमार मामले में गिरफ्तारी को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा था कि अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन है, और ऐसी स्थिति में जमानत या रिहाई का अधिकार बनता है।

अदालत ने गिरफ्तार करने वाले पुलिस अधिकारी, उपनिरीक्षक ज्ञानेंद्र सिंह की कार्रवाई को विधि की अवहेलना बताते हुए इसकी सूचना पुलिस आयुक्त, लखनऊ को भेजने का निर्देश दिया है। साथ ही, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, लखनऊ को आदेश की प्रति भेजी जाएगी, ताकि वे रिमांड मजिस्ट्रेटों को यांत्रिक रूप से रिमांड स्वीकार करने से बचने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश दें। अदालत ने इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले ‘विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य’ (2025 आईएनएससी 162, दिनांक 07.02.2025) का हवाला दिया, जिसमें गिरफ्तारी और रिमांड प्रक्रिया पर सख्त दिशानिर्देश दिए गए हैं इस मामले में हरियाणा पुलिस द्वारा आरोपी को गिरफ्तारी के आधार न बताने और अस्पताल में हथकड़ी लगाने पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई थी, तथा राज्य को दिशानिर्देश जारी करने का आदेश दिया था। लखनऊ कोर्ट ने भी इसी सिद्धांत को लागू करते हुए पुलिस की कार्यशैली पर सवाल उठाए है।

(नोट:यह रिपोर्ट उपलब्ध दस्तावेजों और कानूनी स्रोतों पर आधारित है।)

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