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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पंचायत चुनाव में ‘NOTA’ और उम्मीदवारों के नाम अनिवार्य करने वाली जनहित याचिका पर जवाब तलब किया

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लखनऊ: इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ बेंच) ने उत्तर प्रदेश के ग्रामीण और शहरी मतदाताओं के बीच मताधिकार में असमानता को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका (PIL) पर संज्ञान लिया है। न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने शुक्रवार को राज्य निर्वाचन आयोग और उत्तर प्रदेश सरकार को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

यह याचिका अधिवक्ता सुनील कुमार मौर्य द्वारा दायर की गई है, जिसमें यूपी पंचायत चुनावों की वर्तमान प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि पंचायत चुनाव के मतपत्रों (Ballot Papers) पर न तो उम्मीदवारों के नाम होते हैं और न ही ‘इनमें से कोई नहीं’ (NOTA) का विकल्प होता है।

मुख्य मुद्दा: ‘मनमाना’ वर्गीकरण और भेदभाव

अधिवक्ता अभिषेक यादव, देवेंद्र प्रताप सिंह, मोहम्मद ताहा आमिर और श्री धर पांडेय के माध्यम से दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि नोटा और उम्मीदवारों के नाम न होना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है।

याचिका में एक स्पष्ट विरोधाभास को उजागर किया गया है: जहां राज्य में लोकसभा, विधानसभा और यहां तक कि शहरी स्थानीय निकाय (नगर निकाय) चुनाव मतदाताओं को नोटा का विकल्प और स्पष्ट रूप से छपे उम्मीदवारों के नाम प्रदान करते हैं, वहीं पंचायत चुनाव केवल चुनाव चिह्नों (Symbols) पर निर्भर करते हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह एक “मनमाना वर्गीकरण” है जो ग्रामीण मतदाताओं के साथ शहरी मतदाताओं से अलग व्यवहार करता है और उन्हें सूचित विकल्प से वंचित करता है।

संवैधानिक अधिकार और सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले ‘पीपल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (PUCL) बनाम भारत संघ (2013)‘ का हवाला देते हुए कहा गया है कि “वोट देने के अधिकार में वोट न देने का अधिकार भी शामिल है।”

याचिकाकर्ता का तर्क है कि नोटा का विकल्प न देकर अधिकारी उस मतदाता को मजबूर कर रहे हैं जो सभी उम्मीदवारों को अस्वीकार करना चाहता है; ऐसे में उसे या तो मतदान से दूर रहना पड़ता है या गोपनीयता नियमों का उल्लंघन करना पड़ता है। याचिका में कहा गया है कि गोपनीयता बनाए रखते हुए असहमति दर्ज करने के लिए ‘नोटा’ ही एकमात्र तंत्र है।

इसके अलावा, केवल चुनाव चिह्न छापने से मतदाताओं में भ्रम की स्थिति पैदा होती है, खासकर तब जब कई उम्मीदवारों को एक जैसे दिखने वाले चुनाव चिह्न आवंटित किए जाते हैं। याचिका के अनुसार, यह ग्रामीण नागरिकों को “अंधे होकर वोट करने” पर मजबूर करता है, जो अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।

प्रशासनिक कठिनाइयाँ बनाम मौलिक अधिकार

याचिका में राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा आरटीआई (RTI) के तहत दिए गए एक जवाब को भी रिकॉर्ड पर रखा गया है। 20 अगस्त, 2025 के अपने जवाब में, आयोग ने नोटा न होने की बात स्वीकार की थी और इसके पीछे मतपत्रों की भारी संख्या (55-60 करोड़) और चुनाव चिह्न आवंटन व मतदान के बीच कम समय जैसी तार्किक (logistical) चुनौतियों का हवाला दिया था।

इस दलील को चुनौती देते हुए, याचिकाकर्ता ने प्रस्तुत किया है कि “प्रशासनिक या तार्किक कठिनाइयाँ किसी मौलिक अधिकार को नकारने का आधार नहीं हो सकतीं।” याचिका में प्रतिवादियों के इस कारण को ‘कानूनी रूप से अस्थिर’ बताया गया है और भविष्य के चुनावों में ग्रामीण मतदाताओं के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए ‘परमादेश’ (Writ of Mandamus) जारी करने की मांग की गई है।

हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों (राज्य निर्वाचन आयोग और यूपी सरकार) को जवाबी हलफनामा (Counter-Affidavit) दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को प्रत्युत्तर (Rejoinder) दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। इन सबमिशन के बाद मामले को अगली सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।

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