नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को घरेलू हिंसा से महिलाओं के संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए व्यापक निर्देश जारी किए हैं। यह आदेश “वी द वूमेन ऑफ इंडिया बनाम यूनियन ऑफ इंडिया व अन्य” नामक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया गया।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि देशभर में महिलाओं को घरेलू हिंसा से वास्तविक सुरक्षा और सहायता सुनिश्चित करने के लिए डीवी अधिनियम की धारा 9 के तहत संरक्षण अधिकारियों की अनिवार्य नियुक्ति की जानी चाहिए।
प्रमुख निर्देश इस प्रकार हैं:
- 6 सप्ताह की समयसीमा: न्यायालय ने सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश सरकारों को निर्देश दिया कि जिला और तालुका स्तर पर महिला एवं बाल विकास विभाग के अधिकारियों की पहचान कर उन्हें संरक्षण अधिकारी के रूप में नामित किया जाए, और यह कार्य छह सप्ताह के भीतर पूरा किया जाए।
- प्रचार-प्रसार: डीवी एक्ट और इसके प्रावधानों के बारे में प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया के माध्यम से व्यापक जन जागरूकता अभियान चलाने के आदेश दिए गए हैं, ताकि पीड़ित महिलाएं अपने अधिकारों और उपलब्ध उपायों के प्रति सजग हों।
- आश्रय गृहों की उपलब्धता: अदालत ने निर्देश दिया कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के साथ-साथ महिलाओं के लिए सुरक्षित और उपयुक्त आश्रय गृहों की पहचान और संरचना मजबूत की जाए, जिससे संकट की स्थिति में तत्काल राहत उपलब्ध हो सके।
- निःशुल्क कानूनी सहायता: पीठ ने दोहराया कि डीवी अधिनियम के अंतर्गत महिलाओं को निःशुल्क कानूनी सहायता का अधिकार विवेकाधीन नहीं बल्कि विधिक अधिकार है। प्रत्येक पीड़ित महिला को बिना किसी शुल्क के विधिक सलाह और प्रतिनिधित्व प्राप्त होना चाहिए।
- NALSA की भूमिका: राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) को निर्देश दिया गया कि वह यह सुनिश्चित करे कि इस अधिकार के बारे में हर जिला और तालुका विधिक सेवा प्राधिकरण को सूचित किया जाए और वे तत्काल प्रतिक्रिया देने में सक्षम हों।
- केंद्र की भूमिका: न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि डीवी एक्ट के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी केवल राज्यों पर नहीं छोड़ी जा सकती। केंद्र सरकार को धारा 11 के तहत जागरूकता, प्रशिक्षण और कार्यान्वयन सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक कदम उठाने का आदेश दिया गया।
न्यायालय की टिप्पणी:
“घरेलू हिंसा अधिनियम का उद्देश्य केवल कागज़ी नहीं रह जाना चाहिए, बल्कि इसे ज़मीनी स्तर पर पीड़ितों के लिए वास्तविक और प्रभावी सहायता में रूपांतरित किया जाना चाहिए,” न्यायालय ने टिप्पणी की।
पृष्ठभूमि:
यह आदेश वी द वूमेन ऑफ इंडिया नामक एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा दायर जनहित याचिका पर दिया गया, जिसका प्रतिनिधित्व वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने किया। याचिका में कहा गया था कि देश के कई हिस्सों में डीवी एक्ट का समुचित क्रियान्वयन नहीं हो रहा है, जिससे पीड़ित महिलाएं न्याय और सहायता से वंचित रह जाती हैं।








