नई दिल्ली – सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अशोका विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद को एक फेसबुक पोस्ट को लेकर दी गई गिरफ्तारी के मामले में अंतरिम जमानत प्रदान कर दी। यह पोस्ट ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर आधारित था, जो कि जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ भारत की जवाबी सैन्य कार्रवाई थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने याचिकाकर्ता को अंतरिम राहत तो दी, लेकिन हरियाणा पुलिस द्वारा दर्ज दो एफआईआर को रद्द करने से इनकार कर दिया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने जांच पर रोक लगाने का कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया है।
जमानत की शर्तें:
- याचिकाकर्ता को सीजेएम सोनीपत के समक्ष एक ही जमानत बांड प्रस्तुत करना होगा जो दोनों एफआईआर पर लागू होगा।
- खान को इस विषय पर किसी प्रकार का ऑनलाइन पोस्ट या सार्वजनिक भाषण देने से रोका गया है।
- उन्हें भारत द्वारा हाल ही में झेले गए आतंकी हमलों या जवाबी कार्रवाई पर कोई भी सार्वजनिक टिप्पणी करने से भी वंचित किया गया है।
- कोर्ट ने उन्हें अपना पासपोर्ट भी जमा कराने का आदेश दिया है।
एसआईटी का गठन और जांच में बदलाव:
अदालत ने निर्देश दिया कि मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने हेतु एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जाएगा, जिसमें हरियाणा और दिल्ली राज्य के कोई अधिकारी शामिल नहीं होंगे।
फेसबुक पोस्ट की पृष्ठभूमि:
18 मई को हरियाणा पुलिस ने दिल्ली से महमूदाबाद को गिरफ्तार किया था, जिन पर ऑपरेशन सिंदूर पर की गई सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से भारतीय सेना और राष्ट्र के विरुद्ध भड़काऊ टिप्पणियाँ करने का आरोप है। उन्होंने अपनी पोस्ट में युद्ध की निंदा करते हुए लिखा था कि “भारत ने पाकिस्तान को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि आप आतंकवाद से नहीं निपटते, तो हम निपट लेंगे।”
खान ने अपने पोस्ट में भारतीय सेना की कर्नल सोफिया कुरैशी द्वारा किए गए मीडिया ब्रीफिंग की सराहना करते हुए यह भी कहा था कि असली सम्मान तब होगा जब जमीनी स्तर पर परिवर्तन दिखाई देगा। साथ ही उन्होंने देश में हो रही भीड़ हिंसा और संपत्ति के विध्वंस पर भी चिंता जताई थी।
प्राथमिकी में लगे आरोप:
- पहली एफआईआर में बीएनएस की धारा 196, 197, 152 और 299 के तहत केस दर्ज किया गया है।
- दूसरी एफआईआर हरियाणा महिला आयोग की अध्यक्ष रेणु भाटिया की शिकायत पर दर्ज हुई, जिसमें धारा 353, 79 और 152 के तहत आरोप शामिल हैं।
महिला आयोग ने उनके सोशल मीडिया पोस्ट को महिला सैन्य अधिकारियों के प्रति अपमानजनक बताया था। महमूदाबाद ने एक्स (ट्विटर) पर स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया है।
सुनवाई में हुई बहस:
खान की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उनका पोस्ट पूरी तरह से देशभक्ति की भावना से प्रेरित था और उनका कोई आपराधिक इरादा नहीं था। उन्होंने कहा कि पोस्ट में युद्ध की विभीषिका और उसके मानवीय प्रभावों की चर्चा की गई थी।
हालांकि, पीठ ने पोस्ट की भाषा पर आपत्ति जताते हुए कहा कि “स्वतंत्र अभिव्यक्ति का अधिकार है, लेकिन समय और शब्दों का चयन भी मायने रखता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जानबूझकर ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया जिससे दूसरों की भावनाएं आहत हो सकती हैं।”
निष्कर्ष:
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान करती है, लेकिन सामाजिक शांति और संवेदनशीलता के मद्देनज़र कुछ प्रतिबंध भी जरूरी हैं। महमूदाबाद को अंतरिम राहत मिल गई है, परंतु मामले की जांच पूरी पारदर्शिता के साथ जारी रहेगी।








