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सुप्रीम कोर्ट की भ्रष्टाचार पर चोट: मददगार भी नहीं बचेंगे!

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सुप्रीम कोर्ट की भ्रष्टाचार पर चोट: मददगार भी नहीं बचेंगे!

नई दिल्ली, 14 मई 2025: सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार करने वालों और उनकी मदद करने वालों को सख्त संदेश दे दिया है! कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अगर कोई गैर-सरकारी शख्स, जैसे रिश्तेदार या दोस्त, किसी सरकारी कर्मचारी को भ्रष्टाचार में मदद करता है, तो वो भी जेल जाएगा। यह बड़ा फैसला 13 मई 2025 को जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने सुनाया। अब भ्रष्टाचार में शामिल कोई भी कानून से नहीं बच पाएगा।

फैसले का रिकॉर्ड (जजमेंट केस रेफरेंस)

केस का नाम: पी. शांति पुगाजेंथी बनाम स्टेट
कोर्ट: सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया
जज: जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
तारीख: 13 मई 2025
केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1719/2025

कानून: भ्रष्टाचार रोधी अधिनियम 1988 की धारा 13(1)(e) और भारतीय दंड संहिता की धारा 109

पक्ष:
अपील करने वाला: पी. शांति पुगाजेंथी (वकील: सौरभ जैन)
विरोधी पक्ष: राज्य (वकील: आकांक्षा कौल)

निचली अदालतें:

ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने शांति को दोषी ठहराया था।

मामला क्या है?

पी. शांति पुगाजेंथी एक पूर्व सरकारी कर्मचारी की पत्नी हैं। उन पर इल्जाम था कि उनके पति ने रिश्वत से कमाए पैसों से संपत्ति बनाई और उसे शांति के नाम पर रख दिया। शांति को पता था कि उनके पति की सैलरी इतनी नहीं थी, फिर भी उन्होंने संपत्ति अपने नाम पर रखी। निचली अदालतों ने उन्हें सजा दी। सुप्रीम कोर्ट में शांति ने कहा कि वो सरकारी कर्मचारी नहीं हैं, तो उन पर यह कानून लागू नहीं होना चाहिए। लेकिन कोर्ट ने उनकी अपील ठुकरा दी।

कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने कहा, “कोई भी शख्स, सरकारी हो या न हो, अगर भ्रष्टाचार में मदद करता है, जैसे रिश्वत लेने में साथ देता है या गलत कमाई अपने नाम पर रखता है, तो वो दोषी है।” शांति के मामले में कोर्ट ने देखा कि उनके नाम पर जो संपत्ति थी, वो उनके पति की कमाई से ज्यादा थी और वो इसका जवाब नहीं दे पाईं। इसलिए उनकी सजा बरकरार रही।

सजा होने की दर (कन्विक्शन रेट)

भ्रष्टाचार के मामलों में सजा की दर कम है:

सीबीआई (2023): 71.47% मामलों में सजा हुई, यानी 636 में से 411 को सजा, 140 बरी।

महाराष्ट्र (2022): सिर्फ 9% सजा दर, 90% से ज्यादा बरी।

गुजरात: 40% से ज्यादा सजा दर।

लंबित मामले: 6,903 मामले लटके हैं, 361 मामले 20 साल से पुराने।

क्या दिक्कतें आती हैं?

जांच में कमी: पुलिस को सही ट्रेनिंग नहीं मिलती।
गवाह डरते हैं: गवाह डर के मारे बयान बदल देते हैं।
मामले लटकते हैं: अदालतों में सालों तक केस चलते हैं।
सबूतों की कमी: साफ सबूत मिलना मुश्किल है।

सुझाव क्या हैं?

जांचवालों को अच्छी ट्रेनिंग दो।

गवाहों को सुरक्षा दो, ताकि वो सच बोलें।

स्पेशल कोर्ट बनाओ, ताकि फैसले जल्दी हों।

हर महीने केस की समीक्षा करो।

क्यों खास है यह फैसला?

यह फैसला भ्रष्टाचार करने वालों और उनकी मदद करने वालों को डराने वाला है। अब कोई भी यह सोचकर नहीं बचेगा कि वो सरकारी नौकरी में नहीं है, तो कानून उसका कुछ नहीं बिगाड़ेगा। लेकिन सजा की दर बढ़ाने के लिए सिस्टम को ठीक करना होगा, नहीं तो यह फैसला सिर्फ कागजों तक रहेगा। भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए सबको मिलकर लड़ना होगा।

यह खबर लिटरल लॉ की ओर से है, जो कानूनी खबरें आसानी से आपके सामने लाता है।

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