नई दिल्ली- भारत के निवर्तमान मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) द्वारा आयोजित विदाई समारोह में एक भावुक और विचारोत्तेजक भाषण देते हुए कहा कि आज की कानूनी व्यवस्था में सत्य की गिरती अहमियत उन्हें गहराई से परेशान करती है।
मुख्य न्यायाधीश खन्ना ने कहा, “मैं एक ऐसी बात के बारे में बात करना चाहूंगा जो मुझे परेशान करती है — हमारे पेशे में सत्य की कमी। एक न्यायाधीश सबसे पहले सत्य का खोजी होता है। महात्मा गांधी का मानना था कि ‘सत्य ही ईश्वर है’, और हम सबको उसकी तलाश करनी चाहिए। लेकिन आज हम तथ्यों को छिपाने और जानबूझकर झूठ बोलने के मामलों से घिरे हैं। यह सोच कि सबूतों में जोड़-तोड़ किए बिना सफलता नहीं मिलेगी, न केवल गलत है बल्कि इससे अदालत का काम और भी कठिन हो जाता है।”
अपने दो दशकों से अधिक लंबे न्यायिक करियर को याद करते हुए खन्ना ने कहा कि उन्हें कोई अफसोस नहीं है। “मैं सिर्फ खुश हूं। मैं भारत के मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवा कर पाने को अपना सौभाग्य मानता हूं। दिल्ली हाईकोर्ट का न्यायाधीश बनना मेरे लिए एक सपना सच होने जैसा था।”
खन्ना ने यह भी कहा कि वह अब अपने ‘भीतर के न्यायाधीश’ से छुटकारा पाने को तैयार हैं। “ऐसा लग रहा है जैसे ज़िंदगी का एक नया अध्याय शुरू हो रहा है। 42 वर्षों से मैं कानून के पेशे में हूं — पहले वकील, फिर जज। मेरे माता-पिता ने सादगी और नैतिक मूल्यों से भरा जीवन जिया। मेरी माँ, जो लेडी श्रीराम कॉलेज में हिंदी साहित्य की प्रोफेसर थीं, कभी नहीं चाहती थीं कि मैं वकील बनूं। उन्हें लगता था कि मेरी सादगी मुझे पेशे में सफल नहीं होने देगी। लेकिन आज उन्हें मेरा फैसला सही लग रहा होगा।”
मुख्य न्यायाधीश ने अपने भाषण का समापन सुप्रीम कोर्ट की गरिमा की सराहना के साथ किया:
“यह सर्वोच्च न्यायालय केवल एक संस्था नहीं, न्याय का मंदिर है — एक ऐसी जगह, जहाँ न्याय को घर मिलता है।”








