नई दिल्ली – भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने सोमवार को स्पष्ट किया कि वह वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई नहीं करेंगे। इस बहुचर्चित मामले को अब न्यायमूर्ति बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया गया है।
यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब CJI खन्ना 13 मई, 2025 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। उन्होंने कहा कि मामले में लंबी बहस और विस्तृत अंतरिम आदेश की आवश्यकता है, जिसे अब वे अपने कार्यकाल में पूरा नहीं कर पाएंगे।
मामले की सुनवाई के दौरान CJI खन्ना ने कहा,
“मैं इस चरण में कोई अंतरिम आदेश सुरक्षित नहीं रखना चाहता। इस मामले की सुनवाई अब मेरे समक्ष नहीं होगी। इसे किसी भी उचित दिन न्यायमूर्ति बीआर गवई की पीठ के समक्ष सुना जाएगा।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हम आपके समक्ष बहस करना पसंद करते, लेकिन आपको असुविधा नहीं पहुंचा सकते क्योंकि समय सीमित है।” इस पर CJI ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “नहीं, नहीं, मैं इस सेवानिवृत्ति का इंतजार कर रहा हूं।”
संशोधित कानून और उसकी पृष्ठभूमि
वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025 को संसद ने अप्रैल में पारित किया था — लोकसभा में 3 अप्रैल और राज्यसभा में 4 अप्रैल को। राष्ट्रपति की स्वीकृति 5 अप्रैल को प्राप्त हुई थी। यह अधिनियम 1995 के मूल वक्फ अधिनियम में महत्वपूर्ण संशोधन करता है, खासकर ‘user-defined wakf’ (उपयोगकर्ता द्वारा घोषित वक्फ) की अवधारणा को हटाकर।
इस संशोधन को कई मुस्लिम सांसदों और संगठनों ने संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। कांग्रेस सांसद मोहम्मद जावेद और AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी इस मामले में याचिकाकर्ता हैं।
याचिकाओं में कहा गया है कि संशोधन मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों में अनुचित हस्तक्षेप करता है और ऐतिहासिक मस्जिदों, कब्रिस्तानों व धर्मार्थ संस्थानों की धार्मिक पहचान को खतरे में डालता है, विशेष रूप से वे जिन्हें कोई औपचारिक वक्फ दस्तावेज प्राप्त नहीं है।
केंद्र का बचाव: दुरुपयोग रोकने की कोशिश
केंद्र सरकार ने अदालत में दायर अपने जवाब में कहा कि यह संशोधन वक्फ कानूनों के दुरुपयोग को रोकने के लिए लाया गया है। सरकारी और निजी संपत्तियों को ‘user-defined wakf’ के नाम पर अवैध रूप से कब्जाने की प्रवृत्ति को रोकना आवश्यक था।
सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों की नियुक्ति केवल समावेशिता के उद्देश्य से की गई है और इससे समुदाय के धार्मिक अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
आगे की सुनवाई 14 मई को
सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 14 मई, 2025 को न्यायमूर्ति गवई की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है।








